कैंसर सर्वाइवर्स का कैंप, इलाज के बाद भी संघर्ष:कैंसर से जीतीं, अब खौफ से जंग; 500 महिलाओं ने अकेलेपन को हराना सीखा
पेंसिल्वेनिया की एक झील के किनारे सुबह-सुबह सैकड़ों महिलाएं इकट्ठा हुईं। किसी ने पत्थर पर ‘डर’ लिखा, किसी ने ‘गुस्सा’ और किसी ने ‘चिंता’। फिर वे पत्थर पानी में फेंके गए और आसमान की ओर मुख करके सबने जोर से चीख लगाई। यह कोई अनोखा खेल नहीं था, बल्कि उस डर को बाहर निकालने की कोशिश थी जो कैंसर का इलाज खत्म होने के बाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ता। अमेरिका में आयोजित चार दिवसीय ‘कैंप ब्रेस्टी’ में 500 से अधिक ब्रेस्ट कैंसर सर्वाइवर और मरीज शामिल हुईं। यहां बीमारी का इलाज नहीं, बल्कि उसके बाद की जिंदगी जीने का हौसला सिखाया जाता है। कई महिलाओं ने बताया कि कीमोथेरेपी, सर्जरी और रेडिएशन का दौर खत्म होने के बाद सबसे मुश्किल समय शुरू होता है। परिवार और दोस्त मान लेते हैं कि अब सब सामान्य हो गया है, पर मरीजों के मन में लगातार यह सवाल चलता रहता है कि कहीं कैंसर लौट न आए। इलाज के दौरान अस्पताल का सहारा होता है, लेकिन उसके बाद अक्सर अकेलापन और असुरक्षा घेर लेती है। इसी अनुभव ने कुछ युवा महिलाओं को यह मंच बनाने के लिए प्रेरित किया। वे 20 और 30 की उम्र में कैंसर से जूझीं, लेकिन पारंपरिक सपोर्ट ग्रुप्स में उन्हें अपने जैसे लोग नहीं मिले। किसी की नई-नई शादी हुई थी, कोई छोटे बच्चों की मां थी, तो कोई अपने करियर की शुरुआत कर रही थी। उन्होंने महसूस किया कि कम उम्र के मरीजों की चिंताएं अलग हैं और उन्हें अपने जैसे लोगों के साथ की जरूरत है। आज यह कैंप उसी जरूरत का जवाब बन चुका है। यहां महिलाएं केवल अपना दर्द साझा नहीं करतीं, बल्कि यह भरोसा लेकर लौटती हैं कि कैंसर के बाद की लड़ाई भी अकेले नहीं लड़नी पड़ेगी। यही एहसास उनके लिए सबसे बड़ी दवा और सबसे बड़ा हौसला बन गया है। युवाओं में बढ़ते मामले, 2 घंटे में ही बिक गए टिकट ब्रेस्ट कैंसर से जुड़ी यह पहल अब अमेरिका में तेजी से लोकप्रिय हो रही है। आयोजकों के मुताबिक इस वर्ष कैंप के सभी टिकट दो घंटे से भी कम समय में बिक गए, जबकि पिछले साल भी पंजीकरण कुछ ही दिनों में पूरा हो गया था। हर साल अमेरिका में 3.5 लाख से अधिक महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का पता चलता है और हाल के वर्षों में युवाओं में इसके मामले बढ़े हैं। कैंप की शुरुआत उन महिलाओं ने की थी, जिन्हें कम उम्र में कैंसर का सामना करना पड़ा और जिन्हें अपने जैसे अनुभव वाले लोगों का साथ नहीं मिल रहा था। सोशल मीडिया पर शुरू हुई मुलाकातें बाद में एक बड़े समुदाय में बदल गईं।
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