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हार्वर्ड-स्टैनफर्ड एक्सपर्ट के अनुसार लाइफस्पैन भूलकर सोलस्पैन पर ध्यान दें:सबकुछ पाकर भी खालीपन है तो आत्मिक संतुष्टि जांचिए, अजनबी की मुस्कान इसे बढ़ा देगी

हम अक्सर जीवन प्रत्याशा (लाइफस्पैन) के बारे में सुनते हैं कि इंसान कितने साल जीवित रहने की उम्मीद कर सकता है। पर यह सिर्फ हमारी शारीरिक सेहत व दुनिया में हमारी मौजूदगी के दिनों को गिनता है, इस बात को नहीं कि हमने वह समय कैसे बिताया। जिंदगी की इसी गुणवत्ता, सुकून और खुशियों को नापने का नया पैमाना है- ‘सोलस्पैन’ (आत्मिक प्रत्याशा)। यह हमें सिखाता है कि लंबी जिंदगी जीना बेहतरीन है, पर अर्थ और इंसानी जुड़ाव से भरी जिंदगी, कहीं ज्यादा मायने रखती है। आखिर क्या है सोलस्पैन… और कैसे इसे निखार सकते हैं, जानिए एक्सपर्ट से… सरल शब्दों में ‘सोलस्पैन’ का मतलब यह है कि आप जीवन में खुशी, संतुष्टि और सार्थकता का अनुभव करते हुए कितना जीवंत महसूस करते हैं। मनोवैज्ञानिक डॉ. शेरोन बर्गक्विस्ट बताती हैं, ‘यह रोजमर्रा की भागदौड़ से अलग, आत्मा की खूबसूरत यात्रा है।’ चुनौती वाले काम को 20 मिनट सोलस्पैन सकारात्मक मनोविज्ञान की संकल्पना देने वाले मार्टिन सैलिगमेन कहते हैं, ‘सही मायने में उद्देश्य तब मिलता है जब किसी काम में पूरी तरह डूब जाते हैं। लिखना, कोडिंग करना या खाना बनाना- ऐसे काम हमें ‘फ्लो स्टेट’ (पूरी तरह खो जाना) में ले जाते हैं। रोजाना 20 मिनट छिपी हुई क्षमताओं को चुनौती देने वाले काम में लगाने से ‘सोलस्पैन’ तुरंत बढ़ता है। रोजमर्रा के काम में खो जाना ही असली उद्देश्य है।’ छोटे संपर्क भी कारगर स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक जमील जाकी कहती हैं, अकेलापन दूर करने के लिए हमेशा बहुत गहरे या लंबे रिश्तों की ही जरूरत नहीं होती। जब आप कैफे में कॉफी मेकर से मुस्कुराकर बात करते हैं या लिफ्ट में किसी अजनबी को देखकर सिर हिलाते और अभिवादन करते हैं, तो यह कुछ सेकंड का जुड़ाव भी खुशी में बढ़ोतरी कर देता है। ये छोटे और औचक मानवीय संपर्क जिंदगी को सार्थकता देते हैं। रोज की चीजों में नयापन हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक डॉ. एलेन लैंगर के मुताबिक ‘माइंडफुलनेस’ का मतलब सिर्फ आंखें बंद करके बैठना नहीं है। यह ‘सक्रिय चेतना’ है। इसका अर्थ है रोज की बोरिंग चीजों में भी कुछ नयापन खोजना। जब आप अपने कमरे या रोज के दफ्तर जाने वाले रास्ते को एक नए यात्री की तरह देखते हैं, तो आपका दिमाग वर्तमान में सक्रिय हो जाता है। यह वैचारिक शुध्दिकरण है जो बिना ध्यान भटकाए आपको अहसास कराता है कि आप इसी पल में पूरी तरह जीवित हैं। बिन मांगे दूसरों की मदद काइंडनेस थेरेपी के एक्सपर्ट डॉ. स्टीफन पोस्टकहते हैं, ‘जब हम किसी की बिना किसी स्वार्थ के मदद करते हैं, तो शरीर में जैविक बदलाव होता है। जैसे- किसी भूखे को खाना खिलाना, किसी बुजुर्ग की मदद करना या किसी को कोई हुनर सिखाना…। इस निस्वार्थ सेवा से मस्तिष्क में खुशी के हार्मोन का स्तर तुरंत बढ़ता है। यह वैज्ञानिक रूप से साबित है कि दूसरों की जिंदगी में खुशियां भरने से आत्मिक प्रत्याशा सबसे तेजी से विस्तारित होती है।

Source: Lifestyle

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