पेरेंटिंग- 10 साल का बेटा पॉकेट मनी मांगता है:क्योंकि उसके दोस्तों को मिलती है, क्या इतने छोटे बच्चे को पैसे देना ठीक है?
सवाल- मैं इंदौर से हूं। मेरा 10 साल का एक बेटा है। पिछले कुछ महीनों से वह पॉकेट मनी की मांग करने लगा है। इसकी वजह यह है कि उसके कई दोस्त स्कूल में 10, 20, 50 या कभी-कभी 100 रुपए तक लेकर आते हैं और कैंटीन या दुकानों से चीजें खरीदते हैं। जब बेटा उन्हें पैसे खर्च करते देखता है तो उसे भी वैसा ही करने की इच्छा होती है। मैं कन्फ्यूज हूं कि क्या इस उम्र में पॉकेट मनी देना सही है? कहीं वह खर्चीला तो नहीं बन जाएगा या फिर इससे उसमें जिम्मेदारी की भावना आएगी? मुझे डर है कि अभी से पैसा मिलना शुरू हो गया तो कहीं उसका झुकाव गलत आदतों की तरफ न हो जाए। कृपया बताएं कि बच्चों को कब पॉकेट मनी देना उचित है? मैं अपने बेटे की इस डिमांड को कैसे हैंडल करूं और उसे मनी मैनेजमेंट कैसे सिखाऊं? एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर जवाब- मैं आपकी चिंता अच्छी तरह समझ सकती हूं। हर माता-पिता कभी-न-कभी इस स्थिति से गुजरते हैं। जहां एक तरफ वे चाहते हैं कि उनका बच्चा मनी मैनेजमेंट सीखे। वहीं दूसरी तरफ मन में डर भी रहता है कि कहीं पॉकेट मनी से वह झूठ बोलने, फिजूलखर्ची करने जैसी गलत आदतें न सीख ले। सबसे पहले तो यह समझिए कि आपका बेटा अभी सिर्फ 10 साल का है। उसकी रोजमर्रा की जिंदगी पूरी तरह आपके द्वारा मैनेज होती है। उसका स्कूल आना-जाना तय है। टिफिन घर से लेकर जाता है। खरीदारी खुद नहीं करता और न ही उसे बाहर घूमने, सिनेमा या रेस्टोरेंट जाने की जरूरत पड़ती है। ऐसे में फिलहाल अभी उसे पॉकेट मनी की कोई प्रैक्टिकल जरूरत नहीं है, क्योंकि पैसों से जुड़ी लगभग हर सुविधा आप उसे पहले से ही उपलब्ध करा रही हैं। पॉकेट मनी की डिमांड कैसे हैंडल करें? जब बच्चा अपने दोस्तों को पॉकेट मनी लाते हुए देखता है तो तुलना करना स्वाभाविक है। ऐसे में उसे डांटें नहीं, बल्कि समझाएं कि हर परिवार के नियम, जरूरतें और आर्थिक स्थिति अलग होती है। बच्चे की पॉकेट मनी की डिमांड को समझदारी से संभालने के लिए कुछ आसान और व्यावहारिक तरीकों को समझिए- बच्चे को मनी मैनेजमेंट कैसे सिखाएं? बच्चे को पॉकेट मनी देने से पहले उसे उसकी वैल्यू के बारे में समझाना जरूरी है। इसकी शुरुआत रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतों से की जा सकती है। जैसेकि- बच्चे को मनी मैनेजमेंट सिखाने के और भी कुछ आसान तरीके हैं। जब बच्चा इन छोटी-छोटी बातों को समझने लगता है तो आगे चलकर पॉकेट मनी संभालना उसके लिए आसान हो जाता है। वह खर्च और बचत के फर्क को समझने लगता है। ध्यान रखें, बच्चे सिर्फ बातों से नहीं, पेरेंट्स के व्यवहार से भी सीखते हैं। जब घर में पैसे को लेकर संतुलित, शांत और समझदारी भरा रवैया होता है तो वही पैटर्न बच्चे अपनाते हैं बच्चे को पॉकेट मनी देने की सही उम्र क्या है? इसके लिए कोई फिक्स उम्र नहीं है। यह बच्चे की मैच्योरिटी, खर्च और सेविंग्स की समझ के ऊपर निर्भर करता है। बच्चे को पॉकेट मनी की जरूरत तब होती है, जब उसका सोशल मूवमेंट बढ़ता है। जब वह दोस्तों के साथ बाहर जाता है, खुद से छोटे-छोटे फैसले लेता है और अपनी पसंद की चीजें खरीदता है। ये चीजें आमतौर पर 14-15 साल की उम्र के आसपास आती हैं। इस उम्र में बच्चे घर-स्कूल की सीमित दुनिया से थोड़ा बाहर निकलते हैं और पैसे का इस्तेमाल करना सीखते हैं। बच्चे को पैसे की वैल्यू समझाना जरूरी अक्सर हम बच्चों को पैसे का इस्तेमाल तो सिखाते हैं, लेकिन उससे जुड़े इमोशंस जैसे धैर्य, इंतजार और जिम्मेदारी के बारे में बात नहीं करते हैं। उसे बताएं कि पैसे कमाने के लिए मेहनत, समय और अनुशासन लगता है। इसलिए खर्च से पहले उस बारे में सोचना बहुत जरूरी है। अक्सर बच्चा जब दोस्तों को पैसे खर्च करते हुए देखता है तो उसे लगता है कि पैसा सिर्फ ‘मजा’ और ‘पावर’ देता है। यही सोच आगे चलकर फिजूलखर्ची जैसी आदतें बना सकती है। इसलिए बच्चे को समझाएं कि पैसे का मकसद दिखावा नहीं, जरूरतें पूरी करना है। इससे वह पैसे को जिम्मेदारी से इस्तेमाल करना सीखता है। पॉकेट मनी देने से पहले परखें बच्चे की मैच्योरिटी बिना नियम या लिमिट के पॉकेट मनी देना, हर मांग तुरंत पूरी करना और खर्च पर बातचीत न करना जैसी चीजें बच्चे को फिजूलखर्ची और दिखावे की ओर ले जाती हैं। साथ ही अच्छी पढ़ाई या अच्छे व्यवहार के बदले पैसा देना उसके वैल्यू सिस्टम को कमजोर कर सकता है। इसलिए पॉकेट मनी शुरू करने से पहले यह समझना जरूरी है कि बच्चा मानसिक रूप से जिम्मेदारी निभाने और पैसे को सही तरीके से संभालने के लिए तैयार है या नहीं। अंत में यही कहूंगी कि पॉकेट मनी सिर्फ पैसे देने भर का विषय नहीं है। यह बच्चे के भीतर ईमानदारी, समझदारी और जिम्मेदारी की नींव रखने का एक जरिया भी है। लेकिन 10 साल की उम्र में पॉकेट मनी देने से ज्यादा जरूरी बच्चे को पैसों की वैल्यू समझाना है। उसे जरूरत व चाहत के फर्क से परिचित कराना है। जब बच्चा इसे समझ लेता है, तब पॉकेट मनी उसे बिगाड़ती नहीं, बल्कि ज्यादा समझदार और मैच्योर बनाती है। ………………………… पेरेंटिंग से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए पेरेंटिंग- बेटे को स्कूल में बुली करते हैं: वह गुमसुम रहने लगा है, उसे बुलिंग का सामना करना, हिम्मत से जवाब देना कैसे सिखाएं बुलिंग बच्चे की इमोशनल हेल्थ, पढ़ाई, और सोशल लाइफ को धीरे-धीरे अंदर से तोड़ देती है। बच्चा खुद को असुरक्षित, असहाय और अकेला महसूस करने लगता है। उसका आत्मविश्वास कमजोर पड़ता है और वह छोटी-छोटी बातों से भी डरने लगता है। पूरी खबर पढ़िए…
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